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February 20, 2024

Caste system | full information about caste system


CASTE SYSTEM 


Caste system in India: समाज में जाति व्यवस्था एक पुरानी प्रथा है जो भारतीय समाज के व्यवस्थाओं की विविधता को दर्शाती है । देश के पिछले और वर्तमान में जाति व्यवस्था एक व्यवस्थित सामाजिक व्यवस्था रही है जिसमें समाज के विभिन्न वर्गों और जातियों के साथ यथार्थता के प्रतीत होते हैं । जाति व्यवस्था की प्रमुखता भारतीय समाज में काम, शिक्षा, परिवार और विवाह में देखी जाती है ।

भारतीय जाति व्यवस्था के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए यह महत्वपूर्ण है कि इसे एक प्राचीन और व्यापक समाजिक प्रक्रिया के रूप में देखा जाए । भारत के लगभग हर क्षेत्र और समुदाय में जाति व्यवस्था की भिन्नताओं का प्रभाव देखा जा सकता है, जो समाज की छवि , विचारधारा और व्यवहार पर प्रभाव डालती है ।

Caste?
Indian Caste system



जाति व्यवस्था का मूल उद्देश्य होता है समाज के एकाधिक वर्गों के बीच संतुलन और सद्भाव को बनाए रखना और अलग-अलग श्रेणियों के लोगों के बीच संबंध बनाए रखना है । इसके बावजूद, जाति व्यवस्था का परिणाम सामाजिक और आर्थिक असमानता के रूप में व्यक्त होता है , जो किसी भी सवर्ग को देखते ही देखते हैं । 

जाति व्यवस्था समाज के तंत्र और स्थापत्य के रूप में व्यापक है और इसमें सूचना और विवाद भी होता है । प्राचीनकाल से ही जाति व्यवस्था भारतीय समाज की पहचान की एक अनुचित सूचक है, जिसमें एक विशेष जाति व्यक्ति का समाज में स्थान सामंजस्य होता है ।

हिंदू धर्म की दृष्टि से , जाति व्यवस्था का प्रमुख आधार जाति और वर्ण होते हैं । परंतु, जातियां वर्ण के अंतर्गत आती हैं , जो हमें बताता है कि वर्ण और जाति का अंतर है । यह उल्लेखनीय है कि वर्ण व्यवस्था को केवल हिंदू धर्म की संकेत रूप समझा जा सकता है , जो समाज का एक संगठित निकाय है जिसमें लोगों को उनके कर्तव्यों के आधार पर वर्गीकृत किया गया है ।

जाति व्यवस्था का मूल मकसद था समाज के विभिन्न वर्गों में संतुलन और सम्बंध तैयार करना , लेकिन इसके परिणामतः यह असमानता का रूप ले लेती है । जातिवाद और सामाजिक असमानता के साथ-साथ भारतीय समाज के रूप में प्राथमिक स्थान देता है । समूचा इस विचारधारा में जातियां वर्णों की अविचलता की होती है , जो विभाजन का सबसे मुख्य कारण है ।

जाति व्यवस्था के कारण भारतीय समाज में वृद्धि और विकास के माध्यम से सामाजिक और आर्थिक समपन्नता को लेकर अविश्वसनीय दिक खो चुका है । इसमें व्यक्तिगत या समाज से संबंधित मांग और मान्यताओं के साथ सरकार की नीतियों के दोष भी हैं । इससे सामाजिक हानि होती है और समाज का विकास रुक जाता है ।

जातिवाद के कारण बिना किसी प्राप्ति या क्षमता के व्यक्तियों को उनकी पहचान के आधार पर बाधित किया जाता है । लेकिन सत्ता द्वारा विशेष समुदायों के पक्षपात और प्राथमिकता के कारण जो सामाजिक विछेद बढ़ता है । इससे उन्हें मानवाधिकारों की उपेक्षा की जाती है और उनका उन्नति कार्यक्रमों और सुधारों से फायदा नहीं हो पाता ।

जिस मानव समाज में हर व्यक्ति ने अपनी पहचान को प्राथमिकता दी हो, उसमें ही स्वतंत्रता, समानता और सामाजिक समृद्धि का मूल मंत्र है । इसके बजाय, जातिवाद केवल उसे भ्रामक और विपरीत परिणामकारी संस्कृति का हिस्सा बना रहा है , जो आर्थिक और सामाजिक रूप से गरीबी और असमानता को बढ़ा रहा है ।

इस प्रकार, जाति व्यवस्था एक विचित्र तथ्य है जो भारतीय समाज में आज भी आदान-प्रदान कर रहा है । बिना किसी विचार के, यह विषम परंपराएं लोगों के आचरण और विचारधारा को प्रभावित कर रही हैं , जिससे समाज में असत्ता, विवाद और विभाजन हो रहा है । इसलिए, जरूरी है कि समाज के विकास और समृद्धि के लिए नये और समर्थनशील विचार को प्रोत्साहित किया जाए ताकि समाज में न्याय और समानता की उम्मीद जिन लोगों के प्राणों में बसती हैं, वह साकार हो सके ।

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